त्रिवेणी और अर्थ : तीसरी किश्त


पिछली पोस्ट में मैंने दूसरी त्रिवेणी का अर्थ समझने-समझाने की कोशिश की। किसी भी तरह का सवाल पूछना हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। मैं अपने फ़ेसबुक पेज पर लाइव भी आता रहूँगा ताकि आप सीधे-सीधे सवाल पूछ सकते हैं। फ़िलहाल, आज हम तीसरी त्रिवेणी का अर्थ समझेंगे। पेश है तीसरी किश्त-

त्रिवेणी-3

मेरे ऑफ़िस में महीनों से मेरी दिन की शिफ़्ट तेरे ऑफ़िस में महीनों से तेरी रात की शिफ़्ट

नन्हे बच्चों को तो टुकड़ों में मिले हैं माँ-बाप

भाव-

बड़े-बुजुर्ग कहते रहे हैं कि दिन काम करने के लिए होता है और रात सोने के लिए। हम सबने बचपन में ऐसी बातें सुनी होंगी और हँसे भी होंगे। लेकिन अब वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि करते हैं। दरअस्ल, रात के 12 बजे के बाद और सुबह के 6 बजे से पहले हमारे शरीर का तापमान 2 डिग्री कम हो जाता है। यही समय है जब हमें वास्तविक नींद आती है। इसका कुछ तय नियम नहीं है बल्कि अलग-अलग शरीर में, ये अलग-अलग समय में होता है। हमने ये भी सुना होगा कि आठ घंटे सोने चाहिए। ये एक कॉमन स्लीपिंग ऑवर है लेकिन सबके साथ लागू नहीं किया जा सकता। जिस तरह का आहार हम ग्रहण करते हैं, हमारा शरीर उसी के हिसाब से सोने का समय और पहर तय करता है। लेकिन सोने के रूटीन में हुए बदलाव का असर साफ़-साफ़ रिश्तों में देखा जा सकता है।

अर्थ-

ऊपर दी गई त्रिवेणी में कहा गया है कि शहरीकरण और कॉपोरेट कल्चर के आने के बाद हमारे सोने जागने का रुटीन बदल गया है और इसका सबसे ज़ियादा असर हमारे सम्बंधों पर पड़ा है। पहले जब कोई बच्छा पैदा होता तो माँ-बाप ख़ुद ख़याल रखते थे। तब ज्वाइंट फ़ैमिली हुआ करती थी। शहरीकरण के बाद फ़ैमिली एकल होती चली गई। शहर में कम बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी परवरिश में उनके दादा दादी का योगदान होता है। लोग गाँव से दूर शहर में नौकरी करने आते हैं। इतना अफ़ोर्ड नहीं कर सकते कि अपने पैरेंट्स को साथ रखें। अफ़ोर्ड करना पैसे से ज़ियादा मिज़ाज पर निर्भर करता है। उन्हें लगता है कि उनकी सोच और पैरेंट्स की सोच में अंतर है। ये अंतर मन की दूरी में बदलती जाती है। इसका सीधा असर उनके आने वाले बच्चों पर पड़ता है। जब उसी बच्चे की परवरिश के लिए माँ-बाप कभी डे शिफ़्ट तो कभी नाइट शिफ़्ट में काम करते हैं। चाहकर भी अपने बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम नहीं बिता पाते। कभी माँ साथ होती है, तो पिता नहीं होते। जब पिता होते हैं, तो माँ नहीं होती। ये एक ऐसा दुख है, जो जाने-अनजाने नए पैरेंट्स के दिल में घर कर गया है।

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