त्रिवेणी और अर्थ : पहली किश्त

 

पिछली पोस्ट में मैंने त्रिवेणी विधा के बारे में बात की थी। किसी भी तरह का सवाल पूछना हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। मैं अपने फ़ेसबुक पेज पर लाइव भी आता रहूँगा ताकि आप सीधे-सीधे सवाल पूछ सकते हैं। आज से मैं उन 11 त्रिवेणियों का अर्थ समझाऊँगा जिन्हें सिलेबस में शामिल किया गया है। पेश है पहली किश्त-

 

त्रिवेणी-1

 

माँ मिरी बे-वजह ही रोती है
फ़ोन पर जब भी बात होती है

 

फ़ोन रखने पे मैं भी रोता हूँ

 

भाव-
 

आज के समय में जिस तरह की हमारी लाइफ़ स्टाइल हो गई है, हम में से ज़ियादातर लोग एक उम्र के बाद घर से बाहर रहने लगते हैं। वजह चाहे पढ़ाई हो या फिर नौकरी। हमारे लिए सफल ज़िंदगी के पैमाने बदल गए हैं। दो वक़्त की रोटी जुटाने में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें अपने परिवार, सम्बंधियों और आसपास हो रही घटनाओं की कोई ख़बर नहीं होती। सच तो ये है कि हम सब एक ऐसी ज़िंदगी जी रहे हैं, उसे ज़िंदगी नही एक ‘धीमी मौत’ कहना चाहिए। रोज़ाना ही हमारे भीतर कितने ही इमोशंस मर जाते हैं। एक ख़ास तरह के माहौल में रहने की वजह से हम उन सारी बातों, चीज़ों और घटनाओं से कट जाते हैं जो अच्छी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है।

 

अर्थ-

 

ऊपर दी गई त्रिवेणी में कहा गया है कि जब हम अपनी माँ से बात करते हैं, तो माँ का रोना स्वाभाविक है। क्यूँकि माँ से ज़ियादा क़रीब कोई भी नहीं हो सकता। माँ से ज़ियादा बेहतर हमारे बारे में कोई भी नहीं सोच सकता। माँ का रोना हमें इसीलिए बे-वजह लगता है क्यूँकि हम उन बातों को नहीं समझते, जिन्हें माँ समझती है। अस्ल में, माँ वो सब बातें समझती हैं, जो हम बिना पैरेंट्स हुए नहीं समझ सकते। क्यूँकि कुछ ख़ास अनुभव उम्र के साथ ही होते हैं। हम इसीलिए माँ के सामने नहीं रो पाते, क्यूँकि हमें बचपन से सिखाया जाता है कि रोना बुरी बात है। हम इस तरह की न जाने कितनी ही बातें सीखते हैं, जो हमें इंसान बनने से रोकती हैं। फ़ोन रखने के बाद रोने का मतलब है कि हमारे भीतर इमोशन अब भी ज़िंदा है। समाज लाख समझाए कि लड़कों को नहीं रोना चाहिए क्यूँकि रोना लड़की होने या कमज़ोर होने की निशानी है। ये बात सरासर ग़लत है। दरअस्ल, रोना कमज़ोरी नहीं बल्कि भीतर से ज़िंदा होने की निशानी है।

 

त्रिवेणी संग्रह साँस के सिक्के पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।  

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