त्रिवेणी और अर्थ : ग्यारहवीं किश्त


पिछली पोस्ट में मैंने दसवीं त्रिवेणी का अर्थ समझने-समझाने की कोशिश की। किसी भी तरह का सवाल पूछना हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। मैं अपने फ़ेसबुक पेज पर लाइव भी आता रहूँगा ताकि आप सीधे-सीधे सवाल पूछ सकते हैं। फ़िलहाल, आज हम ग्यारहवीं त्रिवेणी का अर्थ समझेंगे। पेश है ग्यारहवीं किश्त-

त्रिवेणी-11

चाहे कितनी ही मुश्किलें आएँ छोड़ना मत उम्मीद का दामन

ना-उम्मीदी तो मौत है प्यारे!

भाव-

ज़िंदगी में, हम सब अपने लिए कोई न कोई मंज़िल तय करते हैं। हम उस मंज़िल को पाने के लिए जी तोड़ मेहनत भी करते हैं। हम में से कुछ लोगों को उनकी मंज़िल बहुत जल्द मिल जाती है। कुछ लोगों को उनकी मंज़िल मिलने में ज़रा वक़्त लगता है। सच तो ये है कि हम में से ज़ियादातर लोग मंज़िल के पास आकर हौसला हार जाते हैं। कोई शायद दो क़दम दूर तो कोई शायद चार क़दम दूर रह जाता है। इस से दो बातें साफ़ ज़ाहिर होती हैं। पहली, हमारा हौसला टूटने लगा था। दूसरी, हमने अपने हौसले को इतना कमज़ोर बनाया कि मंज़िल से पहले ही दम टूट गया। ऐसे में ये सवाल उठना भी लाज़िमी है कि क्या मंज़िल को पाना ज़रूरी था? क्यूँ कि अगर ज़रूरी होता तो हम उस दिशा में तब तक मेहनत करते, जब तक कि हमें मिल ही नहीं जाती।

अर्थ-

ऊपर दी गई त्रिवेणी में कहा गया है कि हमें रोज़ाना कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम अच्छे दिनों का ख़्वाब देखना भूल जाएँ। ज़िंदगी में हर तरह का वक़्त आता है। अच्छा और बुरा भी। ऐसे दिन भी जब मिट्टी को हाथ लगाओ, तो सोना बन जाए। दिन ख़राब होने पर सोने को हाथ लगाओ तो मिट्टी दिखाई पड़ती है। लेकिन ज़िंदगी इन दोनों से परे है। ज़िंदगी में अगर सिर्फ़ ख़ुशी हो तो ज़िंदगी बेकार लगने लगेगी। ज़िंदगी में अगर सिर्फ़ ग़म हो तो भी बेकार ही लगेगी। सच तो ये है कि हम जैसे-जैसे ख़ुशी और ग़म दोनों का अनुभव करते हैं, हम मुक्त भी होते चले जाते हैं। मुमकिन है एक ऐसा लम्हा भी आए जब हम दोनों से परे हो चुके हैं। उस लम्हे के बाद ज़िंदगी की परेशानी और मुश्किलों से आँखें मिलाने क शऊर आ जाता है। क्यूँ कि अगर हम मुश्किल के वक़्त घबराने लग गए तो हम ना-उम्मीद हो जाएँगे। और एक ना-उम्मीद इंसान का जीना, मरने के बराबर है।

त्रिवेणी संग्रह साँस के सिक्के पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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