त्रिवेणी और अर्थ : दसवीं किश्त


पिछली पोस्ट में मैंने नौवीं त्रिवेणी का अर्थ समझने-समझाने की कोशिश की। किसी भी तरह का सवाल पूछना हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। मैं अपने फ़ेसबुक पेज पर लाइव भी आता रहूँगा ताकि आप सीधे-सीधे सवाल पूछ सकते हैं। फ़िलहाल, आज हम दसवीं त्रिवेणी का अर्थ समझेंगे। पेश है दसवीं किश्त-

त्रिवेणी-10

आँसू ख़ुशियाँ एक ही शय है नाम अलग हैं इनके पेड़ में जैसे बीज छुपा है बीज में पेड़ है जैसे

एक में जिसने दूजा देखा वो ही सच्चा ज्ञानी

भाव-

इस दुनिया में जितनी भी चीज़ें हैं, वो सब जोड़े में हैं। जैसे- आँसू और हँसी। सुख और दुख। सुबह और शाम। औरत और मर्द। सर्दी और गर्मी। धूप और छाँव। अंधेरा और रोशनी वग़ैरह... दोनों ही चीज़ों का वजूद एक दूसरे पर निर्भर करता है। एक के बिना दूसरा पूरा नहीं है। जैसे अंधेरा, रोशनी की अनुपस्थिति है। रोशनी, अंधेरे की अनुपस्थिति है। उसी तरह से हर शय दूसरे की अनुपस्थिति ही है। इस अनुपस्थिति को अक्सर हम नज़रंदाज़ करते हैं। जब हम रोशनी के बारे में बात करते हैं तो अंधेरे का ज़िक्र नहीं करते, जबकि अंधेरे का वजूद मौजूद होता है। क्यूँ कि बीज सिर्फ़ एक बीज नहीं, एक पेड़ की सम्भावना भी है। जब हम किसी भी चीज़ को मुकम्मल तौर पर सोचना चाहते हैं तो उसके दूसरे पहलू पर भी बात करनी ज़रूरी है।

अर्थ-

ऊपर दी गई त्रिवेणी में कहा गया है कि सुख और दुख ज़िंदगी के दो पहलू है। जब हम दुखी होते हैं तो सौ फ़ीसदी दुखी नहीं होते। जब हम सुखी होते हैं तो सौ फ़ीसदी सुखी नहीं होते। दरअस्ल, दुख और सुख प्रतिशतता में होते हैं। जैसे दुख के दिनों में क्यूँ कि दुख की प्रतिशतता निन्यानवे फ़ीसदी होती है तो हमें सुख दिखाई नहीं पड़ता। ठीक वैसे ही, सुख की घड़ियों में सुख निन्यानवे फ़ीसदी होता और दुख एक फ़ीसदी होता है। लेकिन अगर हम ग़ौर से देखें, सोचें और महसूस करें तो ये बात समझ आने लगती है कि दोनों ही स्थितियों में सुख और दुख का घटना-बढ़ना तो लगा रहता है पर हम उतने के उतने ही रहते हैं। सुख और दुख किसी मौसम की तरह आते हैं और चले जाते हैं। सुख के समय भी हमारी आँखों से आँसू आते हैं और दुख के समय में भी हम रोते हैं। इन दोनों आँसुओं में कोई अंतर नहीं है। अंतर है, तो सिर्फ़ देखने के ढंग में, हमारे नज़रिए में। हम जिस तरह से दुनिया को देखना चाहते हैं, दुनिया उसी तरह की दिखाई देती है। सब कुछ होता चला जाता है। हम शून्य की तरह हमेशा मौजूद होते हैं। इतनी सी बात जो इंसान समझ लेता है वही ज्ञानी है।

त्रिवेणी संग्रह साँस के सिक्के पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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