त्रिवेणी और अर्थ : आठवीं किश्त


पिछली पोस्ट में मैंने सातवीं त्रिवेणी का अर्थ समझने-समझाने की कोशिश की। किसी भी तरह का सवाल पूछना हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। मैं अपने फ़ेसबुक पेज पर लाइव भी आता रहूँगा ताकि आप सीधे-सीधे सवाल पूछ सकते हैं। फ़िलहाल, आज हम आठवीं त्रिवेणी का अर्थ समझेंगे। पेश है आठवीं किश्त-

त्रिवेणी-8

ये न सोचो कि ज़रा दूर दिखाई देगा एक ही दीप से आग़ाज़-ए-सफ़र कर लेना

रोशनी होगी जहाँ पर भी क़दम रक्खोगे

भाव-

किसी और पर यक़ीन करने से कहीं ज़ियादा मुश्किल होता है, अपने आप पर यक़ीन करना। किसी और पर किया हुआ यक़ीन कभी-कभी टूट भी सकता है, लेकिन अपने आप पर आया हुआ यक़ीन कभी नहीं टूटता। जब एक दफ़ा अपने पर यक़ीन आ जाता है तो हम किसी भी सफ़र पर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। ज़िंदगी में कोई भी रिस्क लेने के लिए तैयार रहते हैं। फिर हमारे साथ कोई चले या न चले। फिर रात कितनी भी अंधेरी क्यूँ न हो या फिर सफ़र कितना भी लम्बा क्यूँ न हो, हम अकेले ही उस मंज़िल की तरफ़ बढ़ने लगते हैं जिसकी हमें तलाश होती है। इस ख़ुद-यक़ीनी के साथ जब हम आगे बढ़ते हैं, तो हमें अंधेरे में भी रास्ता दिखाई देने लगता है और मंज़िल ख़ुद हमारे स्वागत के लिए तैयार रहती है।

अर्थ-

ऊपर दी गई त्रिवेणी में कहा गया है कि परिस्थिति कैसी भी क्यूँ न हो, हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। मान लें कि रात का समय हो, आपको लम्बे सफ़र पर जाना हो और आपके पास सिर्फ़ एक दीया हो। ऐसे में ये सोचना कि दीये की रोशनी में सिर्फ़ कुछ दूर ही दिखाई पड़ता है, तो लम्बा सफ़र कैसे तय होगा, बेवकूफ़ी होगी। हमें इस बात को समझना होगा कि दीये की रोशनी में भले हम कुछ दूर ही देख सकते हैं, लेकिन अगर यही रोशनी हमारे साथ रही तो हम जैसे-जैसे सफ़र में आगे बढ़ते जाएँगे, हमें रास्ता दिखाई देता रहेगा। ये रोशनी अस्ल में ज्ञान रूपी दीये की है। थोड़ा सा ज्ञान अगर और ज़ियादा सीखने की ललक पैदा करता हो, तो वो ज्ञान उपयोगी है। लेकिन इसके लिए हिम्मत चाहिए, ज्ञान अभी थोड़ा क्यूँ न हो आगे चल कर ज़ियादा हो सकता है। जैसे एक बीज से एक पेड़ पैदा होता है और उस पेड़ पर जब हज़ारों फल लगते हैं तो उन फलों से लाखों बीज बन जाते हैं।

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