कुदरत हमको सिखलाती है


मैं हमेशा ही से मानता हूँ कि बच्चों के लिए लिखना सबसे मुश्किल काम है। फिर भी जब कभी बचपन की याद आती है, कोई नज़्म हो जाती है। पिछले साल महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड (ग्यारहवीं हिंदी पाठ्यक्रम) में मेरी कुछ रचनाएँ शामिल की गईं। और इस साल भारती भवन ने एक नज़्म को आठवीं क्लास के सिलेबस का हिस्सा बनाया है। मैं शुक्रगुज़ार हूँ अपने तमाम चाहने वालों का और अपने बड़ों का और टीचर्स का। बग़ैर उनकी दुआओं के ये मुमकिन नहीं है। फ़िलहाल नज़्म 'कुदरत हमको सिखलाती है' पढ़िए-


कुदरत हमको सिखलाती है

आपस में मिलजुल कर रहना


नदियों के पानी को देखो

कैसे ये बहता रहता है

बारिश धूप हवाएँ सर्दी

अपने तन मन पर सहता है

लेकिन पानी कभी न रुकता

और हमेशा ही कहता है


अपना सागर जब पाना हो

हर पल अपनी धुन में बहना

कुदरत हमको सिखलाती है

आपस में मिलजुल कर रहना


बाग़ों के फूलों को देखो

सौ रंगों में ये खिलते हैं

ऐसा भाई चारा इन में

हँसकर ही हरदम मिलते हैं

ख़ुशबू के संग उड़ जाने को

'हाँ' में इन के सिर हिलते हैं


बूढ़ा माली समझाता है

जो मिल जाए उससे कहना

कुदरत हमको सिखलाती है

आपस में मिलजुल कर रहना


चाहे दुख हो या फिर सुख हो

दोनों हैं मेहमान हमारे

जैसे आते जाते रहते

आँखों में कुछ शोख़ नज़ारे

जैसे बन बन कर मिटते हैं

सदियों से आकाश में तारे


ग़ौर करो तो पाओगे तुम

मौसम है धरती का गहना

कुदरत हमको सिखलाती है

आपस में मिलजुल कर रहना

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