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तमाम मुल्क ही शाहीन बाग़ हो जाए

 

 

नज़्म - शाहीन बाग़

 

मिरा सलाम है उन नौजवान फूलों को 
चमन को छोड़ के जो अब सड़क पे उतरे हैं 
कि रंग उनका ज़ियादा हसीन लगता है 
लबों पे तंज लिए तमतमाए चेहरे हैं

 

मैं कब से देख रहा हूँ कि उनकी आँखों में 
धड़क रहा है नई ज़िंदगी का अफ़्साना 
बुझे-बुझे हुए सारे नसीब जल उट्ठे 
कि चल पड़ा है नई रोशनी का अफ़्साना 

 

फ़िज़ा में फैल रही है वफ़ाओं की ख़ुशबू 
चमक उठी है सितारों की तरह हर धड़कन 
हवा में गूँज रहे हैं सदाओं के घुँघरू 
अवाम कह रही है धज्जियाँ करो दामन

 

अब ऐसे वक़्त में जब चुप रहा नहीं जाता 
मिरा वजूद ये बोले अनेक सच लिक्खूँ
ये मेरी नज़्म गवाही है मेरे होने की 
मैं अपनी ज़ात में रह कर हर एक सच लिक्खूँ 

 

मुझे क़ुबूल है इंसानियत का वो दरिया 
किनारे जिसके अभी तक यक़ीं से रहता हूँ 
मुझे पसंद है अपने गुमान का परचम 
जिसे उठाए हुए मैं सभी से कहता हूँ

 

जो अपने हक़ के लिए उठ खड़े नहीं होते 
उन्हीं की रूह ग़ुलामों की तरह जीती है 
उन्हीं के जिस्म की शहरग यतीम लम्हों में 
शदीद प्यास से मजबूर ज़हर पीती है

 

उन्हीं के खेत में उगते हैं भूख क़े दाने 
जो मिट्टियों की सिफ़ारिश कभी नहीं सुनते 
उन्हीं का मुल्क तरक़्क़ी कभी नहीं करता 
जो नागरिक की गुज़ारिश कभी नहीं सुनते

 

सितम के दिन जो सियाही की तरह लगते हों 
तो एक बात मेरी गाँठ बाँध कर रख लो 
कि पतझड़ों में ही मौसम का दर्द ढलता है 
बहार जल्द ही आएगी कोई दुख न करो

 

अगर निगाह में सूरज का ख़्वाब ज़िंदा है 
तो रात कितनी भी गहरी हो बीत जाएगी 
मिरे अज़ीज़ मिरे दोस्त तुम उम्मीद रखो 
फ़लक पे जल्द ही इक सुब्ह उतर आएगी

 

वतन से इश्क़ किया है सो तुम पे लाज़िम है 
तुम्हारा ज़ेहन भी जलता चिराग़ हो जाए 
लब-ए-फ़क़ीर पे अब ये दुआ ज़रूरी है
तमाम मुल्क ही शाहीन बाग़ हो जाए

 

- त्रिपुरारि

 

 

 

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