टेलिविज़न के लिए मेरा पहला सॉन्ग - सन्युक्त


Tripurari, Debojit Saha, Dhrubo [From left to right]

जुलाई 2016 का आख़िरी हफ़्ता था। एक रोज़ मैं अपने दोस्त/म्युज़िक कम्पोज़र ध्रुव के साथ स्टूडियो जा रहा था, जहाँ हमारे गाने ‘मैं हूँ बेफ़िकर’ की मिक्सिंग हो रही थी। अचानक ध्रुव को सारेगामा प्रोडक्शन हाउस से एक मीटींग के लिए कॉल आई। वहाँ जाने पर पता चला कि उसे सन्युक्त के लिए टायटल सॉन्ग और थीम्स बनाने हैं। क्योंकि ध्रुव के साथ मैं भी वहाँ मौजूद था, सो सीरियल के प्रोड्यूसर/डायरेक्टर अमरप्रीत छावड़ा जी और क्रिएटिव हेड रेणु राणा जी ने मुझे भी गाने का ब्रीफ़ दिया। ...कि गाना किस तरह का होना चाहिए, क्या फील होना चाहिए, क्या मूड होगा, सिचुएशंस क्या क्या हैं, वग़ैरह। मुझे ख़ुशी इस बात की है कि मैंने जो लिखा और ‘ध्रुवज्योति-देबोजीत’ ने जो कम्पोज़ किया उसे एक बार में ही सलेक्ट कर लिया गया। पूरा लिरिक्स इस तरह है-

मुखड़ा-

दीए का उजास बोले सारा आकाश बोले अपनों से होता है संसार आशा की धूप है ये मंदिर का रूप है ये है तेरे पास लेकिन तुझ से ही दूर है ये कहते हैं जिसको परिवार संयुक्त हो संयुक्त हो संयुक्त हो...परिवार

अंतरा-1

एक पल अंधेरा तो दूजा पल सवेरा है रिश्तों की डोर थामे पंछियों का डेरा है जो हम साथ हैं तो हर इक पल यही गाएगा शाख़ों पे मौसम का बसेरा भी मुस्काएगा संयुक्त हो संयुक्त हो संयुक्त हो...परिवार

अंतरा-2

रास्ते में शूल हैं तो माज़ी के फूल भी हैं मन की ये सारी बातें हम को क़बूल भी हैं कोई भी हो मुश्किल करेंगे हमीं आसां मिल के ही बनाएँगे हम इक नया आसमां संयुक्त हो संयुक्त हो संयुक्त हो...परिवार

अंतरा-3

बाँट लेंगे रंग सारे दुख हो या छाया हो ख़ुशियों के चेहरों पे बादल आया जो किरनों की तरह प्यार बरसेगा घर में सदा सूरज ने सितारों ने दी है हमें ये दुआ संयुक्त हो संयुक्त हो संयुक्त हो...परिवार

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