Prologue of North Campus Book

 

अपनी बात

 

लिखना, मेरी सबसे बड़ी मजबूरी है। एक ऐसा काम, जिससे चाहकर भी बचा नहीं जा सकता। आठों पहर महसूस होता है कि ज़ेहन के किसी हिस्से में एक चिराग़ रोशन है। उस चिराग़ की मद्धम रोशनी में मुझे जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसे दर्ज करता हूँ। यूँ तो एक उम्र से ग़ज़ल और नज़्म कहता रहा हूँ मगर हमेशा ही से मुझे इस बात का एहसास था कि बहुत सी बातें ऐसी होती हैं, जिनका बयान शायरी में मुमकिन नहीं है। शायद यही वजह है कि कॉलेज के दिनों में ही कहानी लिखने की शुरूआत हो गई। उस वक़्त मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के खालसा कॉलेज, नॉर्थ कैम्पस में सेकेंड ईयर का स्टूडेंट था। अपनी पहली कहानी लिखी और प्रोफ़ेसर डॉ. वीणा अग्रवाल को पढ़ने के लिए दिया। उन्होंने हौसला अफ़ज़ाई की, लेकिन आगे का सफ़र आसान नहीं रहा। एक कहानी लिखते हुए कम-अज़-कम छह महीने गुज़र जाते थे। छह महीनों तक एक किरदार को हर तरह से जीते रहना और कहानी ख़त्म होने के बाद उस किरदार के असर से बाहर आने की नाक़ाम कोशिश करना एक अजीब प्रोसेस है। इस प्रोसेस में कहानी लिखने वाला ख़ुद कहानी बन जाए तो कोई हैरत की बात नहीं है। ये सिलसिला आज तक बरक़रार है।

 

ज़ेहन की सतह पर बहुत से ख़यालात उभरते हैं, जिनकी सूरत कभी फूल जैसी तो कभी ख़ार की मानिंद होती है। कभी फूल चुनते हुए उंगलियाँ ज़ख़्मी हो जाती हैं, तो कभी ख़ार की नोक की चुभन भी अच्छी लगती है। इसी सिलसिले में दर्द का दवा होना और दवा का ज़हर होना शामिल है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपने आसपास के वाक़ियात को एक नए नज़रिए से देखना और लोगों की तकलीफ़ों को, उनके रोमांच को गहराई से महसूस करना किरदार के वजूद को नई शक्ल देता है। किरदार, जो हर वक़्त मेरे आसपास मौजूद थे, हैं और रहेंगे। बाज़-औक़ात ऐसा भी होता है कि कोई बड़ा हादसा मुतअस्सिर नहीं करता और कोई छोटी सी बात दिल-ओ-दिमाग़ पर हावी हो जाती है। ऐसा कब होता है? क्यूँ होता है? इस सवाल का जवाब ढूँढ़ते हुए कभी न ख़त्म होने वाली बहस की जा सकती है, लेकिन तजरबात का सच महज़ इतना है कि ऐसा होता है। मुझे लगता है कि हर अफ़्साना अपने आप में एक तवील नज़्म है और हर नज़्म, एक मुख़्तसर अफ़्साना है।

 

जब उदास लम्हों की रंगीन तितलियाँ मेरी आँखों में रक़्स करती हैं, तो सीने की वीरानी में अफ़्सानों का एक जंगल उगने लगता है। दरख़्तों की टहनियों पर गाते हुए परिंदों की बोली में मेरे माज़ी के हसीन होंटों की हँसी साफ़ साफ़ सुनी जा सकती है। ग़ौर करने पर ये एहसास भी होगा कि मैंने ख़ुद को अफ़्साना बन जाने से कभी नहीं रोका। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि वक़्त बे-वक़्त मेरा यक़ीन मुझे याद दिलाता रहा कि अफ़्साना हो जाना ही अफ़्साना लिखने का सबसे बेहतर ढंग है। मेरी ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से बहती रही और मैं खुली आँखों से उसे देखता रहा। जैसे आसमान से टूटते हुए पानी को अपने दिल के दरीचे पर खड़े हो कर चुपचाप देखा जाए। न कभी भीगने की ख़्वाहिश पैदा हुई और न सूखे रह जाने का अफ़सोस हुआ। हज़ारों रंग हवाओं में उड़ते रहे और मैं उन्हें हसरत से तकता रहा। अफ़्साने का चेहरा, जिस्म और क़द अपने आप तय होता चला गया। मुझे सिर्फ़ इतना ख़याल रखना पड़ा कि जज़्बात के ज़ीने उतरते हुए मैं कहीं भटक न जाऊँ।

 

ख़ैर! अब वो वक़्त आ गया है जब अफ़्सानों का ये मजमूआ पढ़ने वालों के हाथों में जाए। लेकिन मुझे इस वक़्त अपनी दादी माँ की बहुत याद आ रही है, जिन्होंने मुझे कई अफ़्साने सुनाए थे। शायद उनकी वजह से ही अफ़्साना पढ़ने और बुनने में मेरी दिलचस्पी क़ाएम रह सकी। ये किताब उसी दिलचस्पी का हासिल है।

—त्रिपुरारि

 

 

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