Preface of North Campus Book

 

तआ'रुफ़

 

नॉर्थ कैम्पस, जवाँ-साल शायर और अफ़्साना निगार त्रिपुरारि के अफ़्सानों का पहला मजमूआ है। इस मजमूए में एक कहानी है एल्यूमिनाई मीट, जिसमें वो लिखते हैं, “अलार्म बजते ही मेरी नींद खुल गई। मैंने देखा कि रात ख़त्म हो चुकी थी लेकिन सुबह की आँखों में अब भी नींद का काजल मौजूद था। पीली चादर लपेटे धूप खिड़की से अंदर झाँक रही थी। ये होटल का रूम था, जहाँ हर एक चीज़ अपनी जगह पर थी। कमरे के अंदर एक गमला भी था, जिसके चेहरे पर थोड़ी सी उदासी थी। मैं अपने बिस्तर से उठा और आईने के सामने खड़ा हो गया। मैं सोचने लगा—यही दिल्ली शहर है, जहाँ मैंने ज़िंदगी के आठ बरस बिताए थे। आज फिर आठ बरसों के बाद एल्यूमिनाई मीट में शिरकत करने आया हूँ। जाने कॉलेज में क्या-क्या बदल गया होगा। जाने किस-किस से मुलाक़ात होगी। मैं झटपट तैयार हुआ और कॉलेज के लिए निकल पड़ा।”

 

ऊपर दर्ज पैराग्राफ़ किताब के ज़ियादातर अफ़्सानों की आमाजगाह है। लेखक एक दशक तक दिल्ली की सड़कों, कालेजेज़, आब-ओ-हवा, और ज़िंदगी से रूबरू हुआ है। दिल्ली शहर के मनोविज्ञान, देश भर से यहाँ आने वाले स्टूडेंट्स के मिज़ाज और अतवार में दर आने वाली तब्दीलियों और जिस्मानी रवय्यों को उसने देखा है और रचनात्मक सतह पर पेश करने से पहले उन पर संजीदगी से ग़ौर किया है। इन अफ़्सानों में मौजूद रूमानियत, अपने समय की सच्चाई और कैम्पस की दुनिया की उथल पुथल इकहरी नहीं है बल्कि एक नए समाजी डिस्कोर्स का सच है। अधिकतर कहानियों का रावी एक नौजवान है जिसके ज़ेहन में शायरी की ख़ुशबू रची बसी हुई है। इसीलिए उस के गद्य में ‘सुबह की आँख का काजल’ और ‘गमले के चेहरे पर उदासी’ जैसे शब्दांश मुखर हैं। संक्षेप में कहें तो ‘नॉर्थ कैम्पस’ की कहानियाँ एक युवा रचनाकार की आँखों से देखी गई दिल्ली शहर की कैम्पस लाइफ़ की दिलचस्प डायरी है। इस डायरी में जहाँ सुलगते अनुभवों की आँच है वहीं अनुभूतियों की एक ख़ूबसूरत कहकशाँ भी है, जिसमें नए समय में रिश्तों के बदलते हुए सौन्दर्य की अनुभूति पढ़ने वाले को हैरान कर सकती है।

 

इक्कीसवीं सदी में, हिंदुस्तान में मर्द-औरत के दर्मियान स्वतंत्रात्मक और स्वेच्छात्मक सेक्सुअल रिलेशन का स्वरूप क्या है? सेक्स और सेक्स से संबंधित भावात्मकता से मुक्त होकर, कैसे एक युवा के लिए सेक्स ज़रूरत में बदल जाता है? जिगोलो क्या चीज़ है? समलैंगिकता में प्रेम की क्या सम्भवनाएँ हैं? किस तरह से एक सम्बंध अपनी केंचुली उतार कर दूसरे सम्बंध में बदल जाने का सामर्थ्य रखता है? टूटते-बिखरते जिस्मानी और जज़्बाती  रिश्तों में भी किस तरह से जीवन-रस पाया जा सकता है? कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर हमारे यहाँ समाजी सतह पर बातचीत के दरवाज़े खुल गए हैं। ‘नॉर्थ कैम्पस’ की कहानियाँ भी इसी संवाद की एक कड़ी हैं। ये कहानियाँ एक खिड़की हैं, जिससे झाँक कर पढ़ने वाला अपने समय के गम्भीर विषयों को फ़नकारी के फ्रे़म में देख सकता है। महसूस कर सकता है।

 

आगे बढ़ने की होड़ में युवा पीढ़ी जिस तरह के क्राइसिस से गुज़र रही है, उसने इस पीढ़ी की संवेदना, विचार, जीवन जीने के ढंग और रोज़मर्रा को किस तरह से प्रभावित किया है, इन कहानियों की दूसरी बड़ी ख़ूबी हैI यह अभिव्यक्ति कोई तुक्का नहीं है, बल्कि त्रिपुरारि ने अपने समय की भावात्मक, रागात्मक और मानसिक बदलाव को बयान करने के लिए अपनी शायराना सलाहियतों का हुनरमंदी से इस्तेमाल किया है। उनके गद्य में उपमाएँ और रूपकों का उम्दा इस्तेमाल है, हालाँकि यह सामान्यतः गद्य का विशेष गुण नहीं हैI

 

क्राफ़्ट, प्लॉट और पेशकश में त्रिपुरारि के यहाँ काफ़ी नयापन है। कलात्मकता की बहुत महीन बातों से दरकिनार, जिस तरह इन कहानियों में कथानक खुलता है वो बहुत प्रोत्साहित करने वाली बात है। ये एक निशानी है कि त्रिपुरारि अफ़्साने के जहान-ए-दीगर में, एक लम्बे सफ़र की नीयत कर चुके हैं। अभी इन्होंने लिखना शुरू किया है लेकिन इस संग्रह में शामिल कहानियाँ मसलन नॉर्थ कैम्पस, ब्रेकअप, किराएदार, जिगोलो, सीढ़ियों पर सेक्स, आर्टस फ़ैकल्टी, अफ़ेयर वग़ैरह से ये लगता है कि वो बात कहने का हुनर जानते हैं। अभी उनकी कहानियों का दायरा कैम्पस की ज़िंदगी, शहर-ए-दिल्ली की चकाचौंध से भरी ज़िंदगी और नौजवानी के पुरलुत्फ़ अनुभवों तक सीमित है लेकिन कल वो इन तमाम दायरों से आज़ाद हो कर एक बड़े कैनवास पर अपने अल्फ़ाज़ बिखेर सकते हैं। इन अफ़्सानों को पढ़ कर यही लगता है कि त्रिपुरारि की शुरूआत क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।

                                                                                                                                       —रहमान अब्बास

 

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