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Glimpse of North Campus

 

ये एक अजीब दिलकश मंज़र था। मोहा और मोहसिन आधे-अधूरे भीगते हुए एक ही सेब बारी-बारी से  खा रहे थे। पानी की बूँदें उनके चेहरों को छूते ही रूह ताज़ा कर देती थीं। दिल-ओ-दिमाग़ के दर्मियान एक दीवार पैदा हो रही थी, जिसके दोनों तरफ़ कई अल्फ़ाज़ लिखे थे। हैरानी की बात तो ये थी कि उन तमाम अल्फ़ाज़ के मआनी एक ही लफ़्ज़—मोहब्बत—में सिमट आते थे। मोहा दरख़्त की ओट से बाहर आ गई और साँस-दर-साँस सुलगते हुए खुली बाँहों से बारिश का ख़ैर-मक़्दम करने लगी। उसके धड़कते हुए होंटों पर कई ख़्वाहिशें एक साथ मचलने लगीं। कुछ देर तक ये सब देखते हुए मोहसिन ने महसूस किया कि उसके होंटों की रेत पर एक घरौंदा बनता है और अपने आप बिखर जाता है। उसे भी भीगने की चाहत ने अपनी ज़द में समेट लिया। मोहसिन अब खुले आसमान के नीचे आ गया। उसने मोहा से कहा—

 

ये बारिश कब रुकेगी कौन जाने
कहीं मैं मर न जाऊँ तिश्नगी से 

 

अपनी ज़ुल्फ़ों से परेशान मोहा ने मोहसिन को निगाह भर कर देखा और उसका हाथ अपने रुख़सार पर रख दिया। मोहसिन आहिस्ता-आहिस्ता उसकी लटों को सुलझाने लगा। इतने में, हवा का एक हल्का सा झोंका आया और दोनों के बदन सिहरन से लबालब हो गए। मोहब्बत ख़ुद इस बात की गवाह बनी कि दो बदन एक ही लय में गुनगुनाना चाहते हैं। दो रूहें एक ही धुन पर थिरकना चाहती हैं। ख़ुशी के रंग पपनियों के पोरों पर बिखर गए और किसी अंजान नगर का तसव्वुर करने लगे, जहाँ ज़िंदगी के दामन में कोई भी मरासिम मायूस नहीं होता। जहाँ नींद की शाख़ों पर ख़्वाब के फूल लगते ही चाँदनी ओस बनकर रक़्स करने लगती है। जहाँ उजालों का लम्स पाते ही तीरगी से भरी हुई तमाम तमन्नाओं की कोख ख़ुद पर नाज़ करती है।

 

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