#मज़दूर 

यही है हुक्म कि हम सब घरों में क़ैद रहें 

तो फिर ये कौन हैं सड़कों पे चलते जाते हैं
कि तेज़ धूप में थकता नहीं बदन जिनका
कि जिनकी मौत के दिन रोज़ टलते जाते हैं

हज़ारों मील की दूरी भी तय हुई है मगर
ये बढ़ रहे हैं हथेली पे जान-ओ-दिल को लिए
यतीम पाँव में प्लास्टिक की बोतले...

नज़्म - शाहीन बाग़

मिरा सलाम है उन नौजवान फूलों को 
चमन को छोड़ के जो अब सड़क पे उतरे हैं 
कि रंग उनका ज़ियादा हसीन लगता है 
लबों पे तंज लिए तमतमाए चेहरे हैं

मैं कब से देख रहा हूँ कि उनकी आँखों में 
धड़क रहा है नई ज़िंदगी का अफ़्साना 
बुझे-बुझे हुए सारे नसीब जल उट्ठे 
कि चल पड़ा...

ये लगातार 20 वां बरस है, जब मैं दीपावली में अपने घर पर नहीं हूँ। वैसे ज़रूरी नहीं कि हर दीपावली एक जैसा हो। ख़ैर! मेरे ये चंद अशआर पिछले कई बरसों का हासिल हैं। आप बताएँ कि कौन सा शेर आपको अच्छा लग रहा है? या आप किस शेर क साथ सबसे ज़ियादा कनेक्ट करते हैं?

1.
 

किस की ख़ातिर...

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