अपनी बात

लिखना, मेरी सबसे बड़ी मजबूरी है। एक ऐसा काम, जिससे चाहकर भी बचा नहीं जा सकता। आठों पहर महसूस होता है कि ज़ेहन के किसी हिस्से में एक चिराग़ रोशन है। उस चिराग़ की मद्धम रोशनी में मुझे जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसे दर्ज करता हूँ। यूँ तो एक उम्र से ग़ज़ल और नज़्म कहता रहा हूँ...

तआ'रुफ़

नॉर्थ कैम्पस, जवाँ-साल शायर और अफ़्साना निगार त्रिपुरारि के अफ़्सानों का पहला मजमूआ है। इस मजमूए में एक कहानी है एल्यूमिनाई मीट, जिसमें वो लिखते हैं, “अलार्म बजते ही मेरी नींद खुल गई। मैंने देखा कि रात ख़त्म हो चुकी थी लेकिन सुबह की आँखों में अब भी नींद का काजल मौ...

ये एक अजीब दिलकश मंज़र था। मोहा और मोहसिन आधे-अधूरे भीगते हुए एक ही सेब बारी-बारी से  खा रहे थे। पानी की बूँदें उनके चेहरों को छूते ही रूह ताज़ा कर देती थीं। दिल-ओ-दिमाग़ के दर्मियान एक दीवार पैदा हो रही थी, जिसके दोनों तरफ़ कई अल्फ़ाज़ लिखे थे। हैरानी की बात तो ये थी कि उन...

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