अपनी बात

लिखना, मेरी सबसे बड़ी मजबूरी है। एक ऐसा काम, जिससे चाहकर भी बचा नहीं जा सकता। आठों पहर महसूस होता है कि ज़ेहन के किसी हिस्से में एक चिराग़ रोशन है। उस चिराग़ की मद्धम रोशनी में मुझे जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसे दर्ज करता हूँ। यूँ तो एक उम्र से ग़ज़ल और नज़्म कहता रहा हूँ...

तआ'रुफ़

नॉर्थ कैम्पस, जवाँ-साल शायर और अफ़्साना निगार त्रिपुरारि के अफ़्सानों का पहला मजमूआ है। इस मजमूए में एक कहानी है एल्यूमिनाई मीट, जिसमें वो लिखते हैं, “अलार्म बजते ही मेरी नींद खुल गई। मैंने देखा कि रात ख़त्म हो चुकी थी लेकिन सुबह की आँखों में अब भी नींद का काजल मौ...

युवा शायर-कहानीकार त्रिपुरारि के कहानी संग्रह

नॉर्थ कैम्पस के हिन्दी और उर्दू संस्करण के लोकार्पण समारोह में

नायाब बुक्स, एक्रोस्टिक पोएट्री सोसाइटी और

हिन्दी विभाग (खालसा कॉलेज) आपको सादर आमंत्रित करते हैं

कार्यक्रम-

मुख्य अतिथि- अनंत विजय

वक्ता- स्मिता मिश्र, प्रभात रंजन

त्...

ये एक अजीब दिलकश मंज़र था। मोहा और मोहसिन आधे-अधूरे भीगते हुए एक ही सेब बारी-बारी से  खा रहे थे। पानी की बूँदें उनके चेहरों को छूते ही रूह ताज़ा कर देती थीं। दिल-ओ-दिमाग़ के दर्मियान एक दीवार पैदा हो रही थी, जिसके दोनों तरफ़ कई अल्फ़ाज़ लिखे थे। हैरानी की बात तो ये थी कि उन...

दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैम्पस पर बेस्ड यह किताब 12 अफ़्सानों का कलेक्शन है। इन अफ़्सानों में कॉलेज के पहले दिन से लेकर एल्यूमिनाई मीट तक और नौकरी की फ़िक्र से लेकर दोबारा कैम्पस विज़िट तक के कई तजरबात शामिल हैं। किरदारों के माध्यम से घर से अलग रहने का दुख, बचपन की य...

पेश है लव एंथम ऑफ़ नॉर्थ कैम्पस. किताब की प्री-बुकिंग जल्द ही शुरू होगी. फ़िलहाल ये गीत सुनिए. लिरिक्स कुछ इस तरह हैं.

Adlib-

इश्क़ा इश्क़ा सब कहे इश्क़ा न कोई होए
जब इश्क़ा हो जाइए बैरी अखिया रोए

मुखड़ा-

देखूँ तो नज़रें मेरी
चेहरे से फिसली जाए रे
सीने की वीरानी में
धड़क...

दिल्ली यूनिवर्सिटी का नॉर्थ कैम्पस एक समुंदर की तरह है। जो तैराक जितनी गहराई में उतरने की हिम्मत रखता है, उसे उतनी ही नई चीज़ों के बारे में पता चलता है। मेरा तजरबा यही कहता है कि बाहर से ग्लैमरस दिखने वाली नॉर्थ कैम्पस की एक्साइटिंग लाइफ़ के पीछे बहुत से दर्द छुपे हैं, ज...

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