#मज़दूर 

यही है हुक्म कि हम सब घरों में क़ैद रहें 

तो फिर ये कौन हैं सड़कों पे चलते जाते हैं
कि तेज़ धूप में थकता नहीं बदन जिनका
कि जिनकी मौत के दिन रोज़ टलते जाते हैं

हज़ारों मील की दूरी भी तय हुई है मगर
ये बढ़ रहे हैं हथेली पे जान-ओ-दिल को लिए
यतीम पाँव में प्लास्टिक की बोतले...

अपना नया मदर्स डे स्पेशल गाना- तुम ख़ास हो। ये गाना मेरे लिए दो वजहों से ख़ास है। एक, क्यूँ कि माँ के लिए है। दूसरी बात, मैंने गाने में एक मुख़्तर सी नज़्म का इस्तेमाल किया है। सुनिए, शेयर कीजिए। आप सबको मदर्स डे मुबारक हो...

मुखड़ा-

जब भी कभी दिल डर गया

ऐसा लगा दिल मर गया

तुमन...

कुछ गीत ऐसे होते हैं जिन्हें लिखते हुए आप उस स्टेट ऑफ़ माइंड में होते हैं, जिसमें ज़िंदगी बिताई जा सकती है। अफ़सोस, ऐसा मुमकिन नहीं है। फ़िलहाल ये गाना सुनिए और अपने घर ही में रहिए ताकि आप ख़ुद को और पूरी इंसानियत को महफ़ूज़ रख सकें। 

मुखड़ा-
 

कभी जो सोच लूँ तुझे ज़ेहन महक...

मुखड़ा-

दिल बोले
दिल बोले

दिल बोले इंडिया
अपने इरादों को दुनिया ये देखेगी
किस में दिलेरी है हमको जो रोकेगी
अब हार से न कोई सुलह करेंगे
हम खेल ही नहीं दिल भी फ़तह करेंगे
फ़तह करेंगे...

अंतरा- 

आज तक हर बार ऐसा हुआ है
खेल में भी फ़र्क़ सब ने किया है
क्यूँ हमारे हक़ पे क़ब्ज़ा करते र...

एक लड़की के एहसासों को लिखना हमेशा मुश्किल होता है। मेरी कोशिश कितनी कामयाब हुई, ये आप ही बताइए। सुनिए ये गीत... 

मुखड़ा-

पल जो ये खो रहा 
इसे जी लूँ मैं जी लूँ ज़रा
है जो भी अनकहा
किसे कह दूँ मैं कह दूँ ज़रा 

धीमा धीमा सा था मेरा ये सफ़र
मैं अब नहीं रुकूँ
चाहे ले के जाए...

Dear friends,

thank you for being with me and loving my book 'North Campus'. I am here to present you my latest song 'I Feel It.' Do watch and share with your special one. Read the lyrics below. 

Adlib-
बहुत नाराज़ होना भी 
मोहब्बत का तरीक़ा है
बहुत नाराज़ होना भी 
मोहब्...

नज़्म - शाहीन बाग़

मिरा सलाम है उन नौजवान फूलों को 
चमन को छोड़ के जो अब सड़क पे उतरे हैं 
कि रंग उनका ज़ियादा हसीन लगता है 
लबों पे तंज लिए तमतमाए चेहरे हैं

मैं कब से देख रहा हूँ कि उनकी आँखों में 
धड़क रहा है नई ज़िंदगी का अफ़्साना 
बुझे-बुझे हुए सारे नसीब जल उट्ठे 
कि चल पड़ा...

अपनी बात

लिखना, मेरी सबसे बड़ी मजबूरी है। एक ऐसा काम, जिससे चाहकर भी बचा नहीं जा सकता। आठों पहर महसूस होता है कि ज़ेहन के किसी हिस्से में एक चिराग़ रोशन है। उस चिराग़ की मद्धम रोशनी में मुझे जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसे दर्ज करता हूँ। यूँ तो एक उम्र से ग़ज़ल और नज़्म कहता रहा हूँ...

तआ'रुफ़

नॉर्थ कैम्पस, जवाँ-साल शायर और अफ़्साना निगार त्रिपुरारि के अफ़्सानों का पहला मजमूआ है। इस मजमूए में एक कहानी है एल्यूमिनाई मीट, जिसमें वो लिखते हैं, “अलार्म बजते ही मेरी नींद खुल गई। मैंने देखा कि रात ख़त्म हो चुकी थी लेकिन सुबह की आँखों में अब भी नींद का काजल मौ...

युवा शायर-कहानीकार त्रिपुरारि के कहानी संग्रह

नॉर्थ कैम्पस के हिन्दी और उर्दू संस्करण के लोकार्पण समारोह में

नायाब बुक्स, एक्रोस्टिक पोएट्री सोसाइटी और

हिन्दी विभाग (खालसा कॉलेज) आपको सादर आमंत्रित करते हैं

कार्यक्रम-

मुख्य अतिथि- अनंत विजय

वक्ता- स्मिता मिश्र, प्रभात रंजन

त्...

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